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पुरुष

                            पुरुष               पुरुषों के साथ समाज ने एक विडंबना यह भी कर दी की उन्हें सदा स्त्री पर आश्रित कर दिया गया। पुरुषों के भौतिक, दैहिक व आत्मीय सारे सुखों को केवल स्त्री तक  ही सीमित कर दिया गया। पेट की भूख से लेकर देह की भूख तक सभी का साधन स्त्री। और इनके चलते ही आज पुरुष की स्तिथि मात्र एक कुत्ते की भांति है, जिसे स्त्री रूपी मांस के लोथड़े नाच नचा रहे हैं। पुरुष की मानसिक चेतना को केवल एक सुंदर कामी स्त्री की प्राप्ति तक केंद्रित किया गया।            जबकि होना तो यह चाहिए था कि पुरुषों को आत्मकेंद्रित, स्वावलंबी एवं सदाचारी होने देते। किशोरावस्था से ही उन्हें घरेलू कार्यों के लिए किसी भी स्त्री पर निर्भर होने के बजाए स्वावलंबी होने देते। उन्हें स्त्री का पूरक होने देते, अर्धनारेश्वर होने देते। युवावस्था में उन्हें स्त्री का केवल उपभोगी न होकर सहभागी भी होने देते। नर से नारायण होने देते। पुरुषों की अपार क्षमता, पौरुष, वी...