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पुरुष

                            पुरुष               पुरुषों के साथ समाज ने एक विडंबना यह भी कर दी की उन्हें सदा स्त्री पर आश्रित कर दिया गया। पुरुषों के भौतिक, दैहिक व आत्मीय सारे सुखों को केवल स्त्री तक  ही सीमित कर दिया गया। पेट की भूख से लेकर देह की भूख तक सभी का साधन स्त्री। और इनके चलते ही आज पुरुष की स्तिथि मात्र एक कुत्ते की भांति है, जिसे स्त्री रूपी मांस के लोथड़े नाच नचा रहे हैं। पुरुष की मानसिक चेतना को केवल एक सुंदर कामी स्त्री की प्राप्ति तक केंद्रित किया गया।            जबकि होना तो यह चाहिए था कि पुरुषों को आत्मकेंद्रित, स्वावलंबी एवं सदाचारी होने देते। किशोरावस्था से ही उन्हें घरेलू कार्यों के लिए किसी भी स्त्री पर निर्भर होने के बजाए स्वावलंबी होने देते। उन्हें स्त्री का पूरक होने देते, अर्धनारेश्वर होने देते। युवावस्था में उन्हें स्त्री का केवल उपभोगी न होकर सहभागी भी होने देते। नर से नारायण होने देते। पुरुषों की अपार क्षमता, पौरुष, वी...

तुम थी...

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तू भी जीत जाएगा...

                  तू भी जीत जाएगा... क्या पता था कि  जीवन में एक दौर ऐसा भी आएगा , न हम किसी के अपने रहेंगे और न कोई हमारा सगा रह जाएगा। जिंदगी की उठा पटक में  कोई दोस्त कोई साथी काम न आएगा , सुख दुख की सौगात में जीवन का ये सफर ऐसे यूँही गुजर जाएगा। लाख घना अंधेरा हो फिर एक नया सबेरा जरूर आएगा, रख हौंसला इस पल इन उलझनों से क्या तू हार जाएगा। एक दिन ऐसा होगा तू भी इतिहास रच आएगा, लोगों की भीड़ से परे जग में तू भी जाना जाएगा। फिर तू मुस्कुराएगा। फिर तू जीत जाएगा।।                                                                                             :- संदीप  

पंक्तियाँ प्रेम की...

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  न जाने कब तू मुझमें मुझसे ज्यादा सी हो गई जाने कैसे लोग कई सारी मोहोब्बतें करते हैं,  हमसे तो एक ही न भुलाई जा रही। याद तेरी यूँ ही रुलाई जा रही। नही भुला जा रहा वो तेरा ऐंठना, नही भुला जा रहा वो मेरा चुमना। नहीं भूली जा रही वो तेरी मीठी सी बातें, नहीं भूली जा रही वो मेरी अधजगी सी रातें। नहीं भुला जा रहा तेरे बालों को धुलाना, नहीं भुला जा रहा मेरे गालों को सहलाना। नहीं भूली  जा रही तेरी बचकानियाँ, नहीं भूली जा रही मेरी नादानियाँ। नहीं भुला जा रहा तेरा वो नाम, नहीं भुला जा रहा मेरा वो शाम। नहीं भूली जा रही तेरी संगत, नहीं भूली जा रही मेरी रंगत। हो अगर मिलन दुबारा तो सीता राम सा हो, वरना बिछड़न हमारा तो राधा श्याम सा हो।

काला रंग

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  माना बदसूरत काले  पर हम भी रुतबे वाले  जाना है तुमने ये कहां  दुनिया के जो रखवाले  काले हैं गीता वाले  जिनके हाथों में दो जहाँ  वेदों  के अक्षर काले  पूजा के पत्थर काले  काला है तारों का मकान  लाखों में एक हो माना  पर ये तो सोचो जाना  मेरे ही रंग से हो हसीं  जुल्फ़ें लहराती काली  आँखें वो सुरमें वाली  हाथों का धागा देख लो  सोती हो तुम काले में  छिपती हो तुम काले में  फिर हमसे इतना दूर यूँ  आँखें बंद करके देखो  सपनों के पीछे देखो  मेरे ही रंग के साथ हो  चेहरे का नूर बढ़ाये  छोटा जो तिल पड़ जाये  परियां भी देखें आपको  काली नजरों से बचाये  काला टीका जो लगाए  अब तो समझो ना बात को  आओगे तो जानोगे  रहते हो ऐसे दिल में  जैसे हो मेरा सब तेरा।  तुमसे लम्हा जीता हूँ  तुमको  खुद में बनता हूँ  अब कैसे दूँ मैं इम्तिहां।  ग़र जाना है तो जाओ  इतराना है इतराओ  इतना कहना पर जो मिलें।  बिजली बादल को छोड़े  पानी...

मैं

  दर्द कागज़ पर,           मेरा बिकता रहा, मैं बैचैन था,           रातभर लिखता रहा.. छू रहे थे सब,           बुलंदियाँ आसमान की, मैं सितारों के बीच,           चाँद की तरह छिपता रहा.. अकड होती तो,           कब का टूट गया होता, मैं था नाज़ुक डाली,           जो सबके आगे झुकता रहा.. बदले यहाँ लोगों ने,          रंग अपने-अपने ढंग से, रंग मेरा भी निखरा पर,          मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा.. जिनको जल्दी थी,          वो बढ़ चले मंज़िल की ओर, मैं समन्दर से राज,          गहराई के सीखता रहा..!! साभार : इन्टरनेट (चंद पंक्तियाँ जो दिल को गहराई से छू गयी ,जिनको आप लोगों से साझा करते हुए खुद को रोक न सका।  लेखक जी को मेरी ओर से इन पंक्तियों के लिए धन्यवाद ,क्या खूब लिखा है आपने)
  बड़ा बेटा बड़ा बेटा... जब देखता है, बीमार माँ को, बूढ़े होते बाप को, और बड़ी होती बहन को। भूल जाता है , अपने सारे शौक को। पहन लेता है, जूते बाप के। और उठा लेता है, सारी जिम्मेदारियों को। भूल जाता है, अपने सारे सुनहरे ख्वाबों को। न सफर का पता होता है, और न मंजिल का। फिर भी चल पड़ता है, एक अनजानी डगर को। भूल जाता है, ईश्क़ मोहोब्बत को प्रेम को ,प्रेमी को।