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Showing posts from November, 2020

पंक्तियाँ प्रेम की...

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  न जाने कब तू मुझमें मुझसे ज्यादा सी हो गई जाने कैसे लोग कई सारी मोहोब्बतें करते हैं,  हमसे तो एक ही न भुलाई जा रही। याद तेरी यूँ ही रुलाई जा रही। नही भुला जा रहा वो तेरा ऐंठना, नही भुला जा रहा वो मेरा चुमना। नहीं भूली जा रही वो तेरी मीठी सी बातें, नहीं भूली जा रही वो मेरी अधजगी सी रातें। नहीं भुला जा रहा तेरे बालों को धुलाना, नहीं भुला जा रहा मेरे गालों को सहलाना। नहीं भूली  जा रही तेरी बचकानियाँ, नहीं भूली जा रही मेरी नादानियाँ। नहीं भुला जा रहा तेरा वो नाम, नहीं भुला जा रहा मेरा वो शाम। नहीं भूली जा रही तेरी संगत, नहीं भूली जा रही मेरी रंगत। हो अगर मिलन दुबारा तो सीता राम सा हो, वरना बिछड़न हमारा तो राधा श्याम सा हो।

काला रंग

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  माना बदसूरत काले  पर हम भी रुतबे वाले  जाना है तुमने ये कहां  दुनिया के जो रखवाले  काले हैं गीता वाले  जिनके हाथों में दो जहाँ  वेदों  के अक्षर काले  पूजा के पत्थर काले  काला है तारों का मकान  लाखों में एक हो माना  पर ये तो सोचो जाना  मेरे ही रंग से हो हसीं  जुल्फ़ें लहराती काली  आँखें वो सुरमें वाली  हाथों का धागा देख लो  सोती हो तुम काले में  छिपती हो तुम काले में  फिर हमसे इतना दूर यूँ  आँखें बंद करके देखो  सपनों के पीछे देखो  मेरे ही रंग के साथ हो  चेहरे का नूर बढ़ाये  छोटा जो तिल पड़ जाये  परियां भी देखें आपको  काली नजरों से बचाये  काला टीका जो लगाए  अब तो समझो ना बात को  आओगे तो जानोगे  रहते हो ऐसे दिल में  जैसे हो मेरा सब तेरा।  तुमसे लम्हा जीता हूँ  तुमको  खुद में बनता हूँ  अब कैसे दूँ मैं इम्तिहां।  ग़र जाना है तो जाओ  इतराना है इतराओ  इतना कहना पर जो मिलें।  बिजली बादल को छोड़े  पानी...

मैं

  दर्द कागज़ पर,           मेरा बिकता रहा, मैं बैचैन था,           रातभर लिखता रहा.. छू रहे थे सब,           बुलंदियाँ आसमान की, मैं सितारों के बीच,           चाँद की तरह छिपता रहा.. अकड होती तो,           कब का टूट गया होता, मैं था नाज़ुक डाली,           जो सबके आगे झुकता रहा.. बदले यहाँ लोगों ने,          रंग अपने-अपने ढंग से, रंग मेरा भी निखरा पर,          मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा.. जिनको जल्दी थी,          वो बढ़ चले मंज़िल की ओर, मैं समन्दर से राज,          गहराई के सीखता रहा..!! साभार : इन्टरनेट (चंद पंक्तियाँ जो दिल को गहराई से छू गयी ,जिनको आप लोगों से साझा करते हुए खुद को रोक न सका।  लेखक जी को मेरी ओर से इन पंक्तियों के लिए धन्यवाद ,क्या खूब लिखा है आपने)
  बड़ा बेटा बड़ा बेटा... जब देखता है, बीमार माँ को, बूढ़े होते बाप को, और बड़ी होती बहन को। भूल जाता है , अपने सारे शौक को। पहन लेता है, जूते बाप के। और उठा लेता है, सारी जिम्मेदारियों को। भूल जाता है, अपने सारे सुनहरे ख्वाबों को। न सफर का पता होता है, और न मंजिल का। फिर भी चल पड़ता है, एक अनजानी डगर को। भूल जाता है, ईश्क़ मोहोब्बत को प्रेम को ,प्रेमी को।

मौत मैं मशहूर चाहता हूँ...

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  "मेरे दो - चार ख्वाब हैं... जिन्हें मैं आसमां से दूर चाहता हूँ, ज़िन्दगी चाहे गुमनाम रहे... पर मौत मैं मशहूर चाहता हूँ।" मेरा सब बुरा भी कहना... पर सब अच्छा भी बताना, मैं जब जाऊँ इस दुनिया से... तो मेरी दास्ताँ सुनाना। ये भी बताना की कैसे समंदर जितने से पहले, मैं हज़ारों बार छोटी - छोटी नदियों से हारा था। वो घर, वो ज़मीन दिखाना  कोई मगरूर जो कहे तो शुरुआत मेरी बताना। बताना सफ़ऱ की दुश्वारियां मेरी ताकि कोई जो मेरे जैसी ज़मीन से आए उसके लिए नदियों की धार  हमेशा छोटी ही रहे, और समंदर जितने  का ख्वाब उसकी आंखों से कभी ना जाए। पर उनसे मेरी गलतियाँ भी मत छुपाना  कोई पूछे तो बता देना की  किस - दर्ज़े का नकारा था कह देना की झूठा आवारा था। बताना ज़रूरत पे काम न आ सका, वादे किए पर निभा न सका इन्तेक़ाम सारे पूरे किए मगर इश्क़ निभा न सका बता देना सबको की  वो मतलबी बड़ा था पर हर बड़े मक़ाम पे  अकेले तन्हा ही खड़ा था। "मेरा सब बुरा भी कहना  पर सब अच्छा भी बताना  मैं जब जाऊँ इस दुनिया से  तो मेरी दास्ताँ सुनाना।" (बहुत ही सुंदर पक्तियां है पर अफ़सोस की यह मै...

एक लड़की...

                                             एक रोज़ गाँव में बैठा था आम की छाँव में देखा मैंने एक लड़की पायल पहने पाँव में आँखों में मासूमियत चेहरे पर लाली जैसे आयी हो स्वर्णिम नाँव में सुंदर सुसज्जित गठीली परन्तु विचित्र हावभाव में देख कर लगा ऐसे जैसे फँसी हो किसी दाँव में न जाने क्या थी उसकी दशा तब से रह गया मैं एक अजात घांव में....                                          ---संदीप

न जाने वो कौन होगी...

  न जाने वो कौन होगी... जिसके लिए दिल ये बेताब है, सच में है या महज़ एक  ख़ाब है। न होने पर भी उसी के होने का एहसास है, लगता है जैसे कि वो कहीं आस पास है। मुस्कान लिए एक चेहरा  सपनों में  आता है,  आँख खुलते ही कहीं खो जाता है,  जैसे मुझमें ही कहीं सो जाता है। ढूँढता रहूँ उसे मैं कहाँ, जिस अजनबी के लिए  दिल मे बसा है एक जहाँ...                                                                                                                    ---संदीप